रचनात्मक झूठ.

रचनात्मक झूठ.

 

उस कच्ची उम्र मे ,
बड़े आंकड़े भिडाते थे .
इस नन्ही जान पर ,
किसमत को आजमाते थे .

खुद बनाकार भिन्न पक्ष
हम उसूल से मुखर जाते ,
फिर हारने पर ,
खुद ही को झुट्ला जाते .

वाह रे बचपन ,
क्या खूब सिखाया,
तब नहीं , वो हमें ,
आज ज्ञात आया .

तब लगा वो झूठ ,
अब कही उस झूठ ने ,
आज है मुझको दोहराया .
की कभी भूलूँ नहीं मैं,
खुद पर भरोसा करना .

                            – यश मैनाली 

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Yash Mainali
Doesn't matter how many new blooms are there. Feeling for the very first one is totally conserved. No other can replace the feel of essence in prime florescence I had for.

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