ये सफर कैसा ?

ये सफर कैसा ?

 

उस खंडहर से ज्यादा आज ,
ये महल वीरान लगता है .
कई चेहरे थे वहाँ.
अब कुछ चुने रह गये यहाँ .
हर पहर खुशियाँ थी .
नाचती-थिरकती तितलियाँ .
सफर वहाँ से यहाँ तक का ,तय होने मे,
काफी कुछ खो आये हम .
यादों की दूरी कुछ दूर नहीं .
बस कदम दो कदम है .
बस सामने यूँ नज़र है .

उस खंडहर से ज्यादा आज ,
ये महल वीरान लगता है .
क्या चलती थी वहाँ !
खुशियों की लहरें.
यहाँ है बस उफान ही उफान.
वहाँ सजा था पूरा साज ,
यहाँ बिखर गया पूरा साज .
सफर वहाँ से यहाँ तक का ,तय होने मे,
काफी कुछ खो आये हम .
यादों की दूरी कुछ दूर नहीं .
बस कदम दो कदम है .
बस सामने यूँ नज़र है .

उस खंडहर से ज्यादा आज ,
ये महल वीरान लगता है .
                               -यश मैनाली

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Yash Mainali
Doesn't matter how many new blooms are there. Feeling for the very first one is totally conserved. No other can replace the feel of essence in prime florescence I had for.

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