ए-ज़िन्दगी

ए-ज़िन्दगी

चर्चा मे रखकर उन्हे ,
अब क्या करते हो ज़नाब ?
जब थे तब खिदमत नहीं .
अब उनके जाने का दोश कही .

वाह रे वक्त !
हालातों का तो चश्मदीद होता तू .
कम से कम उंगलियां और नज़र तो न उठती .

चलो गर उठे सही ,
बन्दा तो सही करार हो .
खैर , तुम्हे क्या पता ,
बात उन रैनो की .
छोड़ दिया गया था ,
किसी वीराने मे कही .

अब मुड कर मैं भी क्या देखू ?
रूह थरथराती है .
गर आ भी जाएँ पाशीमा लाश पर अब.
तो बता ?
लाऊं कहाँ से तुझे ए-ज़िन्दगी ?
                                    -यश मैनाली

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Yash Mainali
Doesn't matter how many new blooms are there. Feeling for the very first one is totally conserved. No other can replace the feel of essence in prime florescence I had for.

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