एक निरंतर यात्रा .

एक निरंतर यात्रा .

 

कुछ रंग छूट रहे हैं ,
कुछ रंग चढ़ रहे हैं .
थमे रहो तुम ,
बेरंग नहीं हो रहा हूँ ,
खुशरंग हो रहा हूँ .

अभी तो इतमिनान से ,
ठहरा रहूँगा यहाँ कुछ देर ,
समय है अभी होने को ढेर .
कुछ मिसालें उभरेंगी .
फिर ये नसें उभरेंगी ,

अभी तो मिले हैं ज़मी से,
खुद को अलग कर खुद से,
सफर तह तक का तय है.
अब बनना मुझे मृत्तिका है
वापस तुझ तक पोहचना है
इन उथली दरारो की राह से.

कुछ भार कम सा है ,
कुछ बातें कम सी हैं .
ज़रा देखो तुम,
क्या सुकून मिलता है .

जब ज़र्रा-ज़र्रा
अर्श से उतरकर फर्श से मिलता है .

-यश मैनाली

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Yash Mainali
Doesn't matter how many new blooms are there. Feeling for the very first one is totally conserved. No other can replace the feel of essence in prime florescence I had for.

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