वो साया.

वो साया.

अकेला हूँ यारो,पहले भी था!

पर अब महसूस होता है ,

एक साया सा आता था सपनों मैं,

रात के अँधेरे मैं नहीं दिन के उजाले मैं

एक रिश्ता सा बन गया था,खुद को जानने का ज़रिया सा बन गया था

एक दिन अचानक एक चेहरा आया सामने ,

कुछ जाना सा कुछ पेहचाना सा 

देखा होगा पहले,आंखों ने नहीं पर दिल ने ज़रूर

शायद उस साये ने एक चेहरा ले लिया था,

ज़िंदगी को मकसद एक गेहरा दे  दिया था

मुहब्बत सी हो गयी थी , सिर्फ उससे ही नहीं उसकी मुस्कुराहट से भी ,

यूँ तो दिल धड़कता है मेरा भी, पर उसे देख रुक सा जाता था ,

उसके चेहरे के नूर से वक़्त भी खिलखिला जाता था,

मेरी दुश्मन थी वो हवाएँ जो उसकी ज़ुल्फों को छेड़ा करती थी,

याद है उसकी अदायें जब वो ज़ुल्फों से खेला करती थी

ना होती वो सामने तो दिल मेरा रो जाता था,

उसकी यादों की गलियों में वक़्त मेरा खो जाता था

उसको सोचे बिना रातें मेरी ना सोती थी,

उसके सपनों के बिना सुबह मेरी ना होती थी

एक अँधेरा ना जाने कहाँ से आया जिसमें खोया वो प्यारा साया,

अब रातें मेरी अकेली हें और दिन भी मेरा खाली है,

नाम उसके जो लिखा था खत, दबा हुआ है किताबों में,

 उसकी बातों की वो खुश्बू खो गयी है हवाओं में

उसके नाम का दर्द मैने दिल मैं अपने सम्भला है ,

उसकी मीठी यादों का ही अब तो एक सहारा है

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vinay punetha

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