यह उस शाम की बात है , जब चाँद और आफ़ताब आपस  में गुफ्तगू कर रहे थे यूँही कुछ हलकी ठंडी हवाओ का चर्चा पूरे शहर में था।

न मैंने पहले कभी उसे इतने खूबसूरत लिबास में देखा था न उसने  कभी मेरा यूँ दीदार किया था |

तनहा यू बैठा  हुआ मैं उस पल का दीदार कर लिया करता हूँ ,जिस मुस्कराहट चाँद को आफताब से मिलवाया था उस मुस्कराते हुए चेहरे को रब से मांग लिए करता हूँ |

उसकी खूबसूरती का चर्चा का सरेआम  था ,वह नशीली आँखे इस शहर की भीड़ मेँ  कहा गुम होगयी बस यही सवाल आम था |

मैंने उसकी तस्वीर कागज़ पर अपनी आँखों से उतारी थी ,वह मुस्कराहट फिर मिले बस यही दुआ हर दिन हर पल मांगी थी |

उसे मैंने बाजार मे आज कुछ अलग लिबास मे देखा था ,हैरत हुई मगर मेरी मोहब्बत का पहरा उस हैरत से भी गहरा था |

बटवारे के उस माहोल मे भी उसकी मोहब्बत नें मुझे एक इंसान बनाया था।

एक  हिन्दू मुसलमान की मोहब्बत नें हर घर मे दंगा भड़काया था,उस रात मज़हबी बटवारे नें हर इंसान को हैवान बनाया था |