बेदर्दी ने पिछले महीने जो कलाई मरोड़ी थी
वो आज भी नीली है
उसे तो मैं कंगन से छिपा लुंगी
देह पे लगे हजारों घाव
जो टाँके से सिली हैं
उनपे मैं चुनर से ओढ़ा लुंगी
और मेरी सिरहान जो रातों के रोदन
से गीली है
उनपे मैं नया चादर बिछा दूंगी
और किसी को भनक भी नहीं लगेगी
मेरे रसोई में हर रात क्या पकता है
चूल्हे में मेरी इज़्ज़त
मेरे ही सहनशीलता के मिट्टीतेल से जलता है

पर मेरे राजा,
तुम अब भी अल्हड अनाडी हो
तुम्हे इसका जरा भी अनुमान नहीं
यह आग अपने चर्म पे जब दमकेगा
तुम्हे निगल जाएगा फिर भी थम लेगा
इसमें जलेंगे ये सारे जिन्दा मुर्दे
जिनके घर की दीवारे मेरे घर से जुडी है
जिनकी चेतना की चिड़िया कबकी उडी है
इन्ही क साथ राख हो जाएंगे
इनके सारे देवता और भगवान्
जो इन्हे पत्थर के घरों में
सोने क पालकी में है विराजमान
क्यों की इसी पत्थर को साक्षी मान कर
हम तुम्हारे साथ आने को सज्जित थे
आज मेरी चीखें सिसकिया सुनकर
यह मुस्कुरा रहें फिर भी ना लज्जित थे

पता नहीं क्यों प्राण प्रिये,
तुम्हारे अकल में छोटी सी ये बात ना जाए
तुम सोच बैठे टीवी फ्रिज और मोटरसाइकिल
के साथ हम भी दहेज़ में है आये
जब तक नयी रहूंगी अपना मन बहलाओगे
जब मन करे मेरा सीना सहलाओगे

अब बस मेरे साजन,
अब इस बार वार हम करेंगे
और मेरा प्रहार व्यर्थ नहीं जाएगा
:सौ सोनार की एक लोहार की”
तुम्हे अर्थ समझाएगा
मेरे प्रताडन के हवन कुंड में
तुम्हारे गुमान का घी चढ़ाएंगे
तुम्हारे मर्दानगी की अस्थिया
शौच के नाले में बहाएंगे
यह देख कर
ये मुर्दे दर्शक थरथर कापेंगे
और फिर उसी पत्थर के सामने “हरे राम” जपेंगे
इनकी घर की छतें रंगमंच बन जाएंगी
और इनके घर की जीवित देवियाँ
इन्हे इनकी अत्याचार की कढ़ाई में पकाएंगी …..