Dekho Woh Agya

Dekho Woh Agya
जा चूका था जो सालों पहले
आज भूलते भटकते अपने घर आया है
कुछ बुझे हुए सपनो की बाती
कुछ बीतें हुए दिनों की झांकी
अपने बास्ते में समेट के लाया है
 
जिन आँखों ने इक इक कतरे में
सदायें थी बहाई
वो अब सूख चुकी थी
उम्मीद की बाँध भी टूट चुकी थी
न कोई रोया उसे देख कर
ना किसी ने उसे गले से लगाया है
 
उसे लगा शायद थोड़े से नाराज है ये
शायद तोहफे निकलवाने का कोई अंदाज़ है ये
रेडियो निकाल के रख दिया सामने उनके
और बोलै “बाबा ,बताना कैसा लगेगा सुन के “
 
जिसको सुनने के लिए उनकी रूह तड़प क रह गयी
और ना जाने कितने ताने सुन क सह गयी
वो बुद्धू उनको रेडियो से बहलाएगा
और बर्फ सी जमी मन को मखमली लिहाफ से पिघलाएगा
 
तभी हुआ माहौल में अजीब परिवर्तन
भूल गए वो अपना मरण समान  जीवन
कचरे को चीरती हुई आँशु की धरा
बहा ले गयी उनका दुःख दर्द सारा 
 
फिर मंद मुस्कान के साथ वह बोले
चल रख के सामान हाथ पाओं ढोले
तेरी माँ ने खाने के डब्बे है खोले
आ गए तुम , खत्म सारी चिंता हमारी
क्यों ? अभी भी पसंद है ना
बैगन की कलौंजी और भिंडी करारी?
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Shobhit Mishra
Perpetually lost in the ocean of exploration
Lives a life in denial to surface someday

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