ना तुम्से तुम्हारी ही शिकायत् करु

ना तुम्से तुम्हारी ही  शिकायत् करु

मै तुम्हारे इत्ने करीब् नहि कि तुम्से तुम्हारी   शिकायत्  कर् सकु,,

पर् तुम्से इत्नि दूर् भी नही की अपने मन् की बात् ना केह् सकु।

वादे तो निभाये हमने भी खूब् है खुद् के,

पर् अब् उन् वादो के लिये ना ही जी सकू ना ही मर् सकू।

बाते तो बहुत् की थी एक् दफा तुम्से,

उन् बातो को ही ना गल्ती मानने लग् जाउ।

इत्नी हिम्मत् मत् देना फिर् कही मुझे,

कि तुम्से ही तुम्हारी शिकायत् करने लग् जाउ।

अपनी हर तरफ एक अन्द्धेरा सा पाया था कबी,

उस्स अन्द्धेरे की वजह खुद को ही बताया था कबी।

भूल गये है जब हम उस अन्द्धेरे को और औरो की कही बातो को,

खुद को हर खता का दोशी पाया है तबी।

लोगो की चाहत से बहुत दूर निकल आयी हू,

वापिस जाने की किसी की हीदायत ना मान सकू।

फिर कबी भी मुझे इत्ने करीब मत लाना कि,

तुम्से ही तुम्हारि शिकायत कर सकू।

खुश रेहने की कोशिश पूरी है ज़िन्दगी में ,

खुश रखने की भी की थी कबी।

आज जब पलत के पीछे देखा खुद की गल्तियोन को,

बस एक बात जेहन मे आयी तबी।

कि भूल से भी मुझे अपने इत्ने करीब मत लाना की तुम्से तुम्हारी ही शिकायत कर सकू,

पर अपने आप से इत्ना दूर भी मत करना कि अपने मन की बात भी ना केह सकू।

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Ria Mishra
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