शब्दों की आवाज़

शब्दों की आवाज़
रूठ से गए हैं शब्द मुझसे
मुझे कहा उन्होने अहंकारी है
"कवयित्री कहती हो खुद को,
क्या यही तुम्हारी जिम्मेदारी है " ?

बीती इतनी जो घटनाएँ हैं
जिनके चित्रण को हम आतुर हैं
हम ही तो हैं, जिनके कारण
कायर दिल भी बहादुर है

घटना, विचार और अनुभूति
इन्हें शब्दों का ही तो सहारा है
वेदना,व्यथा,सुख, उल्लास
सबको शब्दों ने स्वीकारा है

कोई चेहरा नहीं जिन एहसासों का
शब्दों के पास उनका रूप व पहचान है
इन अक्षरों की ताकत जो न समझा
वह खूबसूरती से अनजान है

कवि का हृदय भी रचना बिन व्याकुल है
भागेगा कबतक अभिव्यक्ति से,
पृथ्वी आखिर गोल है
तुम कवियों के कारण ही तो
हम शब्दों का इतना मोल है ||


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Mansi Srivastava

1 Comment

  1. हिंदी पढ़ कर अच्छा लगा, आज कल इस कालजयी भाषा के प्रेमी काम ही मिलते हैं। जो रस हिंदी में मिलता है वो और कहीं नहीं है।

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