यहीं कहीं

इस ज़मीं से बिछड़े है ,
किसी ज़मीं पर हम आज भी मिलते हैं .
इस पार तो नज़र आते नहीं ,
उस पार आज भी दीदार होता है .

दूर थे कहीं ,
नज़र फिर भी यहीं थी .
कहीं आसमां मे भी रहकर ,
नज़रें ज़मी पर ही थी .

छोडा नहीं है साथ ,
हर दम साथ ही हो .
कभी आईना देखूँ ,
कभी खुद में देखूँ ,
जहाँ कही भी देखूँ ,
बस आप ही हो .

मंडराती पुतलियां जो कभी ,
आये आंगान मेरे ,
एहसास बस तुम्हारा ही लाये .
बड़ी कीमती हैं ये यादें मेरी ,
कहीं इन्ही यादों की ,
बस्ती मेरी ज़िन्दगी है .

– यश मैनाली