संपूर्ण यात्रा.

संपूर्ण यात्रा.

घाटियो से तय हो सफर,पहुच सके मंज़िल तक. इन मोड़ो से उस सीध तक, हो मेरी भी एक संपूर्ण यात्रा. घने दरख़्तों के बीच से, कहीं खुले मैदानो तक. तो कही उस रेत तक.गुजरे ये रेल कभी फूलो के बीच,कंकड़ और कांटे भी सही. जायका हर मौसम का सही. हो मेरी भी एक संपूर्ण यात्रा. भय नही कि ये सफर, बीच मे ही थम जाये. चाह है कि ये सफर, राह देते-देते थक जाये. अपने हिस्से के मध्य पड़ाव सारे, धीरे धीरे बढ़ते चलूँ. हो मेरी भी एक संपूर्ण यात्रा. इंतज़ार है मुझे भी, उन साहिलो के समीर का, तट की ठंडी रेत का, जहा बैठे सुकून से देखूं, समुद्र दर्पण पर चमकती, शाम की बिखरती लाली. हो मेरी भी एक संपूर्ण यात्रा. हासिल कर सकूँ जब मंज़िल, देखू जमीं पर पैरो के निशान. फिर तलब एक आखिरी पेंग की,जो पहुचा सके वापस मुझे, मेरे उस प्रारंभ तक. और भर सकूँ एक गहरी सांस.तो हो मेरी भी एक संपूर्ण यात्रा. – यश...
Kurbani ka ansh

Kurbani ka ansh

Shayad bohot zyada ho chla hai ye desh ke lie pyaar Tabhi to har roz kisi na kisi ko kehte sunta hu Kyun karte ho itni chinta yuhin Jo desh ke lie mare the vo chale gaye Shayad tumhare lie chale gaye honge Par mere lie nahi Abhi bhi unka Ansh hai yahan Dekhna chahoge? Apne pairon ke niche ki zamin ko tatolo Dikha kuch? Yehi to hai unka Ansh Yehi matti hai unki nishani Hamare lie piche chorh gye yeh swatantra or ekjut bharat 23 saal ki umar main to shayad khud ko niharne se fursat na mile Soch sakte ho us umar main kisi ne faansi ke fande ko chuma tha Swatantra or ekjut Bharat ke lie Tum shayad bhul sakte ho par main nahi Unki kurbani aaj shayad fikki pad gyi ho Par unki di gayi matti hamesha hamare saath...

आत्म मंथन

दिल भरा हैगला रूूूग्ध हैहै एक सवाल मन का मंन सेमिला नहीं कोई ,पूछ सकूँ जिससेविषय गंभीर हैह्रदय अधीर हैचाह विमर्श की नहींचाह है मंंथन कीराहगीर चोटिल हैहै रक्त आसुओं का सैलाबमनुष्य माात्र मूूक दर्शक हैपहने मानवता का नकाब.परिभाषाएं हुई परिवर्त्ति्त हैंपशुओं कि वफादारी अब अधिक चर्चित हैशेष नहीं अब मनुष्यता का अंशफैला हर जगह है ज़हरीला दंंशहृदय के पत्थर को पिघलाना होगामनुष्यता को फिर से जगाना. होगाजीवन काल अभी शेष हैजिसे सार्थक करने ्अब आगेे आना...
लालायित पुष्प.

लालायित पुष्प.

लालायित पुष्प. घने बांज के दरख्तों के बीच तू छुप तो गया, मगर अब इंतज़ार है शबनमी रात का. ये कलिया झूम रही है, और ये शीतल झोके उन्हे झुला रहे है. अब तू उस पार है, ना जाने रात कहां? चांदिनी का बेसबब इंतज़ार है. सड़क किनारे आशा मे खिले, ये रिझाते है विचरनेवालो को. कोई तो देखे इन श्वेत नन्हो को. देखने वाले भी अजीब है, देख कर सुकून पाते है. पास आकर, स्नेह का फेर देते हुए, रात्री का पैगाम कोई नहीं लाता. फिर उचक-उचक के, हवा के साथ ये लेहलेहाते. दूबते सूरज की लाली और फीकी किरणो से, खुद अन्दाज़ लगाते. आशा मे झूम रहे है, कि कब आयेगी भीगी चांदिनी?..                                    – यश...

दास्तां_1

वादा -ए -मोहब्बत करते थे आजतक, अब झूठा आईना नज़र आने लगे.. धूल क्या झोंकी उसने आँखों में, के मंज़र साफ़ नज़र आने लगे.. आलम ए दर्द इस क़दर, लबों पर हसीं,आंखों में समन्दर ए अश्क़ नज़र आने लगे.. ढूंढते रहे खुद ही खुदी में ख़ामियां उम्रभर.. हर एक पल ज़र्रा ज़र्रा बिख़र जाने लगे.. कतरा कतरा जलाया ख़ुद को दर्द ए याद में उसकी, ना ख़बर ख़ुद की ना ख़बर दुनिया की, रफ़्ता रफ़्ता मिट जाने लगे… हुई फ़ना ज़िन्दगी  हुआ  एतबार टूटा,टूटा दिल, फिर भी बनकर बारिश ए इश्क़, उस पर बरस जाने लगे.....
अविराम पथिक

अविराम पथिक

पथिक हूँ चिरकाल का ,एक सतत मार्ग का अनुगामी हूँ , क्या मोह करूँ इस काया का जिसका खुद न में स्वामी हूँ  हूँ भाग स्वयं स्रष्टि क्रम का ,उस काल कवि का पाठ हूँ  ये देह तो बस चोला है में जीवन रुपी नाट्य हूँ  मानवेन्द्र सिंह...