शब भर तो कमसकम..

शब भर तो कमसकम..

शब भर तो कमसकम लफ्ज़ों को आराम करने दो।
कुछ देर को ठहरकर बस धड़कन को काम करने दो।

शब भर तो कमसकम..

 जिस सफर में तुम हो, उसे मीलों में नहीं तौला करते,
नम लाख हुई हों आँखें, होंठो को नहीं खोला करते।
हर ज़ख्म को मुनासिब मलहम भी मुकम्मल होगा,
तुम वक़्त को ज़रा काबिल आलिम का इंतज़ाम करने दो!

शब भर तो कमसकम..

 उस रोज़ जिसे देखा था, दिल में बड़ी तस्वीरें ली थी,
जिस नूर के लिए तुमने इस चाँद की तशबीहें दी थीं।
वो रूठ गया तो क्या ग़म, साकी को नया जाम भरने दो।
वो चाँद न हुआ तो आखिर, इस चाँद को ही शाम करने दो।

शब भर तो कमसकम..

 

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Aditya Pratap Singh

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